BG 2.56 — सांख्य योग
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दुःखेष्वनुद्विग्नमनाःसुखेषुविगतस्पृहः|वीतरागभयक्रोधःस्थितधीर्मुनिरुच्यते||२-५६||
duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ . vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate ||2-56||
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः: in adversity | सुखेषु: in pleasure | विगतस्पृहः: without hankering | वीतरागभयक्रोधः: free from attachment, fear and anger | स्थितधीर्मुनिरुच्यते: of steady wisdom
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जिसका मन दुःखों में विचलित नहीं होता, जो सुखों की लालसा से मुक्त है, और जिससे राग, भय तथा क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है。
English
Swami Gambirananda
Swami Adidevananda
Hindi
Swami Ramsukhdas
Sanskrit
Sri Ramanuja
Sri Madhavacharya
Sri Anandgiri
Sri Jayatirtha
Sri Abhinav Gupta
Sri Madhusudan Saraswati
Sri Sridhara Swami
Sri Dhanpati
Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sri Purushottamji
Sri Neelkanth
Sri Vallabhacharya
Swami Ramsukhdas Commentary
।।2.56।। दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।
।।2.56।। व्याख्या-- [अर्जुनने तो स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है ऐसा क्रियाकी प्रधानताको लेकर प्रश्न किया था पर भगवान् भावकी प्रधानताको लेकर उत्तर देते हैं क्योंकि क्रियाओंमें भाव ही मुख्य है। क्रियामात्र भावपूर्वक ही होती है। भाव बदलनेसे क्रिया बदल जाती है अर्थात् बाहरसे क्रिया वैसी ही दीखनेपर भी वास्तवमें क्रिया वैसी नहीं रहती। उसी भावकी बात भगवान् यहाँ कह रहे हैं] (टिप्पणी प0   94) ।  'दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः'-- दुखोंकी सम्भावना और उनकी प्राप्ति होनेपर भी जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता अर्थात् कर्तव्य-कर्म करते समय कर्म करनेमें बाधा लग जाना, निन्दा-अपमान होना, कर्मका फल प्रतिकूल होना आदि-आदि प्रतिकूलताएँ आनेपर भी उसके मनमें उद्वेग नहीं होता। कर्मयोगीके मनमें उद्वेग, हलचल न होनेका कारण यह है कि उसका मुख्य कर्तव्य होता है--दूसरोंके हितके लिये कर्म करना, कर्मोंको साङ्गोपाङ्ग करना, कर्मोंके फलमें कहीं आसक्ति, ममता, कामना न हो जाय--इस विषयमें सावधान रहना। ऐसा करनेसे उसके मनमें एक प्रसन्नता रहती है। उस प्रसन्नताके कारण कितनी ही प्रतिकूलता आनेपर भी उसके मनमें उद्वेग नहीं होता।  'सुखेषु विगतस्पृहः'-- सुखोंकी सम्भावना और उनकी प्राप्ति होनेपर भी जिसके भीतर स्पृहा नहीं होती अर्थात् वर्तमानमें कर्मोंका साङ्गोपाङ्ग हो जाना, तात्कालिक आदर और प्रशंसा होना, अनुकूल फल मिल जाना आदि-आदि अनुकूलताएँ आनेपर भी उसके मनमें 'यह परिस्थिति ऐसी ही बनी रहे; यह परिस्थिति सदा मिलती रहे--ऐसी स्पृहा नहीं होती। उसके अन्तःकरणमें अनुकूलताका कुछ भी असर नहीं होता।  'वीतरागभयक्रोधः'-- संसारके पदार्थोंका मनपर जो रंग चढ़ जाता है उसको  'राग'  कहते हैं। पदार्थोंमें राग होनेपर अगर कोई सबल व्यक्ति उन पदार्थोंका नाश करता है, उनसे सम्बन्ध-विच्छेद कराता है, उनकी प्राप्तिमें विघ्न डालता है, तो मनमें  'भय'  होता है। अगर वह व्यक्ति निर्बल होता है, तो मनमें  'क्रोध'  होता है। परन्तु जिसके भीतर दूसरोंको सुख पहुँचानेका, उनका हित करनेका, उनकी सेवी करनेका भाव जाग्रत् हो जाता है, उसका राग स्वाभाविक ही मिट जाता है। रागके मि़टनेसे भय और क्रोध भी नहीं रहते। अतः वह राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो जाता है। जबतक आंशिकरूपसे उद्वेग, स्पृहा, राग, भय और क्रोध रहते हैं, तबतक वह साधक होता है। इनसे सर्वथा रहित होनेपर वह सिद्ध हो जाता है। [वासना, कामना आदि सभी एक रागके ही स्वरूप हैं। केवल वासनाका तारतम्य होनेसे उसके अलग-अलग नाम होते हैं; जैसे अन्तःकरणमें जो छिपा हुआ राग रहता है, उसका नाम  'वासना'  है। उस वासनाका ही दूसरा नाम  'आसक्ति' और प्रियता है। मेरेको वस्तु मिल जाय--ऐसी जो इच्छा होती है, उसका नाम  'कामना'  है। कामना पूरी होनेकी जो सम्भावना है, उसका नाम  'आशा' है। कामना पूरी होनेपर भी पदार्थोंके बढ़नेकी तथा पदार्थोंके और मिलनेकी जो इच्छा होती है, उसका नाम  'लोभ'  है। लोभकी मात्रा अधिक बढ़ जानेका नाम  'तृष्णा'  है। तात्पर्य है कि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंमें जो खिंचाव है, श्रेष्ठ और महत्त्व-बुद्धि है, उसीको वासना, कामना आदि नामोंसे कहते हैं।] 'स्थितधीर्मुनिरुच्यते'-- ऐसे मननशील कर्मयोगीकी बुद्धि स्थिर, अटल हो जाती है।  'मुनि'  शब्द वाणीपर लागू होता है, इसलिये भगवान्ने  'किं प्रभाषेत'  के उत्तरमें  'मुनि'  शब्द कह दिया है। परन्तु वास्तवमें  'मुनि'  शब्द केवल वाणीपर ही अवलम्बित नहीं है। इसीलिये भगवान्ने सत्रहवें अध्यायमें  'मौन'  शब्दका प्रयोग मानसिक तपमें किया है, वाणीके तपमें नहीं (17। 16)। कर्मयोगका प्रकरण होनेसे यहाँ मननशील कर्मयोगीको मुनि कहा गया है। मननशीलताका तात्पर्य है--सावधानीका मनन, जिससे कि मनमें कोई कामना-आसक्ति न आ जाय। निरन्तर अनासक्त रहना ही सिद्ध कर्मयोगीकी सावधानी है; क्योंकि पहले साधक-अवस्थामें उसकी ऐसी सावधानी रही है (गीता 3। 19) और इसीसे वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुआ है।