BG 2.24 — Sankhya Yoga
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अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्यएव|नित्यःसर्वगतःस्थाणुरचलोऽयंसनातनः||२-२४||
acchedyo.ayamadāhyo.ayamakledyo.aśoṣya eva ca . nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo.ayaṃ sanātanaḥ ||2-24||
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य: cannot be cut | एव: also | च: and | नित्यः: eternal | सर्वगतः: all-pervading | स्थाणुरचलोऽयं: stable | सनातनः: ancient
Swami Sivananda English Translation
2.24 This Self cannot be cut, burnt, wetted, nor dried up. It is eternal, all-pervading, stable, immovable and ancient.
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
यह आत्मा न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है, न गीली हो सकती है, न सुखाई जा सकती है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
English
Swami Gambirananda
Swami Adidevananda
Hindi
Swami Ramsukhdas
Sanskrit
Sri Ramanuja
Sri Madhavacharya
Sri Anandgiri
Sri Jayatirtha
Sri Abhinav Gupta
Sri Madhusudan Saraswati
Sri Sridhara Swami
Sri Dhanpati
Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sri Purushottamji
Sri Neelkanth
Sri Vallabhacharya
Sri Abhinav Gupta Commentary (English)
2.24 See Comment under 2.25
Swami Ramsukhdas Commentary (Hindi)
।।2.24।। यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है।
।।2.24।। व्याख्या--  [शस्त्र आदि इस शरीरीमें विकार क्यों नहीं करते यह बात इस श्लोकमें कहते हैं।]  'अच्छेद्योऽयम्'-- शस्त्र इस शरीरीका छेदन नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि शस्त्रोंका अभाव है या शस्त्र चलानेवाला अयोग्य है प्रत्युत छेदनरूपी क्रिया शरीरीमें प्रविष्ट ही नहीं हो सकती यह छेदन होनेके योग्य ही नहीं है। शस्त्रके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी इस शरीरीका छेदन नहीं हो सकता। जैसे याज्ञवल्क्यके प्रश्नका उत्तर न दे सकनेके कारण उनके शापसे शाकल्यका मस्तक कटकर गिर गया (बृहदारण्यक0)। इस प्रकार देह तो मन्त्रोंसे वाणीसे कट सकता है पर देही सर्वथा अछेद्य है।  'अदाह्योऽयम्'-- यह शरीरी अदाह्य है क्योंकि इसमें जलनेकी योग्यता ही नहीं है। अग्निके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी यह देही जल नहीं सकता। जैसे दमयन्तीके शाप देनेसे व्याध बिना अग्निके जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार अग्नि शाप आदिसे वही जल सकता है जो जलनेयोग्य होता है। इस देहीमें तो दहनक्रियाका प्रवेश ही नहीं हो सकता।  'अक्लेद्यः'-- यह देही गीला होनेयोग्य नहीं है अर्थात् इसमें गीला होनेकी योग्यता ही नहीं है। जलसे एवं मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह गीला नहीं हो सकता। जैसे सुननेमें आता है कि मालकोश रागके गाये जानेसे पत्थर भी गीला हो जाता है चन्द्रमाको देखनेसे चन्द्रकान्तमणि गीली हो जाती है। परन्तु यह देही रागरागिनी आदिसे गीली होनेवाली वस्तु नहीं है।  'अशोष्यः'-- यह देही अशोष्य है। वायुसे इसका शोषण हो जाय यह ऐसी वस्तु नहीं है क्योंकि इसमें शोषणक्रियाका प्रवेश ही नहीं होता। वायुसे तथा मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह देही सूख नहीं सकता। जैसे अगस्त्य ऋषि समुद्रका शोषण कर गये ऐसे इस देहीका कोई अपनी शक्तिसे शोषण नहीं कर सकता।  'एव च'-- अर्जुन नाशकी सम्भावनाको लेकर शोक कर रहे थे। इसलिये शरीरीको अच्छेद्य अदाह्य अक्लेद्य और अशोष्य कहकर भगवान्  'एव च'  पदोंसे विशेष जोर देकर कहते हैं कि यह शरीरी तो ऐसा ही है। इसमें किसी भी क्रियाका प्रवेश नहीं होता। अतः यह शरीरी शोक करनेयोग्य है ही नहीं।  'नित्यः'-- यह देही नित्यनिरन्तर रहनेवाला है। यह किसी कालमें नहीं था और किसी कालमें नहीं रहेगा ऐसी बात नहीं है किन्तु यह सब कालमें नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहनेवाला है।  'सर्वगतः'-- यह देही सब कालमें ज्योंकात्यों ही रहता है तो यह किसी देशमें रहता होगा इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति वस्तु शरीर आदिमें एकरूपसे विराजमान है।  'अचलः'-- यह सर्वगत है तो यह कहीं आताजाता भी होगा इसपर कहते हैं कि यह देही स्थिर स्वभाववाला है अर्थात् इसमें कभी यहाँ और कभी वहाँ इस प्रकार आनेजानेकी क्रिया नहीं है।  'स्थाणुः'-- यह स्थिर स्वभाववाला है कहीं आताजाता नहीं यह बात ठीक है पर इसमें कम्पन तो होता होगा जैसे वृक्ष एक जगह ही रहता है कहीं भी आताजाता नहीं पर वह एक जगह रहता हुआ ही हिलता है ऐसे ही इस देहीमें भी हिलनेकी क्रिया होती होगी इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही स्थाणु है अर्थात् इसमें हिलनेकी क्रिया नहीं है।  'सनातनः'-- यह देही अचल है स्थाणु है यह बात तो ठीक है पर यह कभी पैदा भी होता होगा इसपर कहते हैं कि यह सनातन है अनादि है सदासे है। यह किसी समय नहीं था ऐसा सम्भव ही नहीं है।  'विशेष बात'  यह संसार अनित्य है एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। परन्तु जो सदा रहनेवाला है जिसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता उस देहीकी तरफ लक्ष्य करानेमें  'नित्यः'पदका तात्पर्य है। देखने सुनने पढ़ने समझनेमें जो कुछ प्राकृत संसार आता है उसमें जो सब जगह परिपूर्ण तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें  'सर्वगतः'  पदका तात्पर्य है। संसारमात्रमें जो कुछ वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदि हैं वे सबकेसब चलायमान हैं। उन चलायमान वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदिमें जो अपने स्वरूपसे कभी चलायमान (विचलित) नहीं होता उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें  'अचलः' पदका तात्पर्य है। प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें प्रतिक्षण क्रिया होती रहती है परिवर्तन होता रहता है। ऐसे परिवर्तनशील संसारमें जो क्रियारहित परिवर्तनरहित स्थायी स्वभाववाला तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें  'स्थाणुः'  पदका तात्पर्य है। मात्र प्राकृत पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा ये पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे। परन्तु जो न उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है तथा जो पहले भी था और पीछे भी हरदम रहेगा उस तत्त्व(देही)की तरफ लक्ष्य करानेमें  'सनातनः' पदका तात्पर्य है। उपर्युक्त पाँचों विशेषणोंका तात्पर्य है कि शरीरसंसारके साथ तादात्म्य होनेपर भी और शरीरशरीरीभावका अलगअलग अनुभव न होनेपर भी शरीरी नित्यनिरन्तर एकरस एकरूप रहता है।