श्रीमद्भगवद्गीता
Chapter 1 — अर्जुन विषाद योग
47 Verses (Shlokas)
◀
Chapter 1 — अर्जुन विषाद योग
▶
BG 1.1
धृतराष्ट्र ने कहा -- हे संजय, धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
BG 1.2
संजय ने कहा — पाण्डव-सैन्य की व्यूह रचना देखकर राजा दुर्योधन ने आचार्य द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।
BG 1.3
हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गयी पाण्डु पुत्रों की इस महती सेना को देखिए।
BG 1.4
इस सेना में महान धनुर्धारी शूर योद्धा हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं, जैसे युयुधान, विराट और महारथी राजा द्रुपद।
BG 1.5
धृष्टकेतु, चेकितान, बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य।
BG 1.6
पराक्रमी युधामन्यु, बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) और द्रोपदी के पुत्र — ये सब महारथी हैं।
BG 1.7
हे द्विजोत्तम ! हमारे पक्ष में भी जो विशिष्ट योद्धागण हैं, उन्हें आप जान लें; अपनी सेना के नायकों के नाम मैं आपको बताता हूँ।
BG 1.8
एक तो स्वयं आप, भीष्म, कर्ण और युद्ध विजयी कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र है।
BG 1.9
मेरे लिए प्राण त्याग करने के लिए तैयार, अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित तथा युद्ध में कुशल और भी अनेक शूर वीर हैं।
BG 1.10
भीष्म के द्वारा रक्षित हमारी यह सेना अपर्याप्त है; किन्तु भीम के द्वारा रक्षित उनकी सेना पर्याप्त है।
BG 1.11
आप सब अपनी-अपनी स्थिति में, सेना के सभी मोर्चों पर, भीष्म पितामह की ही रक्षा करें।
BG 1.12
उस समय कौरवों में वृद्ध, प्रतापी पितामह भीष्म ने उस (दुर्योधन) के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुये उच्च स्वर में गरज कर शंखध्वनि की।
BG 1.13
तत्पश्चात् शंख, भेरी, पणव, अनक और गोमुख आदि वाद्य एक साथ ही बज उठे और वह शब्द अत्यंत भयंकर हो गया।
BG 1.14
इसके उपरान्त श्वेत अश्वों से युक्त भव्य रथ में बैठे हुये माधव (श्रीकृष्ण) और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाये।
BG 1.15
भगवान् हृषीकेश ने पांचजन्य, धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त तथा भयंकर कर्म करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
BG 1.16
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नामक शंख बजाया; नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।
BG 1.17
श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अजेय सात्यकि।
BG 1.18
हे राजन् ! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु सौभद्र (अभिमन्यु) इन सभी ने अलग-अलग शंख बजाये।
BG 1.19
वह भयंकर घोष आकाश और पृथ्वी पर गूँजने लगा और उसने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिये।
BG 1.20
हे महीपते ! जब युद्ध आरंभ होने ही वाला था, कपिध्वज अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को स्थित देखकर धनुष उठाया, तब उन्होंने भगवान् हृषीकेश से ये वचन कहे।
BG 1.21
अर्जुन ने कहा: हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये।
BG 1.22
मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में इस प्रकार खड़ा करो कि मैं युद्ध की इच्छा से यहाँ उपस्थित इन सबको देख सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किनके साथ युद्ध करना है।
BG 1.23
मैं उन युद्ध करने वालों को देखूँगा, जो दुर्बुद्धि धार्तराष्ट्र (दुर्योधन) का युद्ध में प्रिय चाहने वाले ये राजा लोग यहाँ एकत्र हुए हैं।
BG 1.24
संजय ने कहा — हे भारत (धृतराष्ट्र) ! अर्जुन के ऐसा कहने पर भगवान् हृषीकेश ने दोनों सेनाओं के मध्य उत्तम रथ को खड़ा करके।
BG 1.25
भीष्म, द्रोण तथा पृथ्वी के समस्त शासकों के समक्ष उन्होंने कहा, "हे पार्थ, देखो इन एकत्र हुए कौरवों को।"
BG 1.26
वहाँ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े हुए पिता के भाइयों, पितामहों, आचार्यों, मामों, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और सुहृदों को भी देखा।
BG 1.27
दोनों ही सेनाओं में ससुरों और मित्रों को तथा उन सब बन्धु-बान्धवों को इस प्रकार खड़े देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन का मन करुणा से भर गया और वे विषादयुक्त होकर यह कहने लगे।
BG 1.28
अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छा रखकर उपस्थित हुए इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है और शरीर में कंपन तथा रोमांच हो रहा है।
BG 1.29
अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छा रखकर उपस्थित हुए इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हुये जाते हैं, मुख भी सूख रहा है और मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच हो रहा है।
BG 1.30
मेरे हाथ से गाण्डीव (धनुष) फिसल रहा है और मेरी त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, और मैं खड़े रहने में असमर्थ हूँ।
BG 1.31
हे केशव ! मैं शकुनों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर कोई कल्याण भी नहीं देखता हूँ।
BG 1.32
।।1.32।।हे कृष्ण ! मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य और न सुखों को ही चाहता हूँ। हे गोविन्द ! हमें राज्य से अथवा भोगों से और जीने से भी क्या प्रयोजन है?।
BG 1.33
जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुखों की कामना करते हैं, वे ही धन और प्राण की आशा को त्यागकर इस युद्ध में खड़े हैं।
BG 1.34
आचार्याः, पितरः, पुत्राः, पितामहाः, मातुलाः, श्वशुराः, पौत्राः, श्यालाः और अन्य सम्बन्धी – भगवान् श्रीकृष्ण।
BG 1.35
।।1.35।।हे मधुसूदन ! इनके मुझे मारने पर अथवा त्रैलोक्य के राज्य के लिये भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए कहना ही क्या है।
BG 1.36
हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों का वध करने से तो हमें केवल पाप ही प्राप्त होगा।
BG 1.37
इसलिए हे माधव ! अपने बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए योग्य नहीं है, क्योंकि स्वजनों को मारकर हम सुखी कैसे होंगे?
BG 1.38
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुलनाशकृत दोष और मित्र द्रोह में पाप नहीं देखते हैं।
BG 1.39
हे जनार्दन! कुलक्षय से होने वाले दोष को जानने वाले हम लोग इस पाप से विरत होने के लिए क्यों नहीं सोचना चाहिये?
BG 1.40
कुल के नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है।
BG 1.41
हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
BG 1.42
।।1.42।।वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने का कारण बनता है। पिण्ड और जलदान की क्रिया से वंचित इनके पितर भी नरक में गिर जाते हैं।
BG 1.43
इन वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघाती दोषों से सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं।
BG 1.44
हे जनार्दन, हमने सुना है कि जिनके यहाँ कुल धर्म नष्ट हो जाता है, उन मनुष्यों का अनियत काल तक नरक में वास होता है।
BG 1.45
अहो ! शोक है कि हम लोग बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, जो कि इस राज्यसुख के लोभ से अपने कुटुम्ब का नाश करने के लिये तैयार हो गये हैं।
BG 1.46
यदि मुझ शस्त्ररहित और प्रतिकार न करने वाले को ये शस्त्रधारी कौरव रण में मारें, तो वह मेरे लिए कल्याणकारक होगा।
BG 1.47
संजय ने कहा — रणभूमि (संख्ये) में शोक से उद्विग्न मनवाला अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणसहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
↑