BG 1.18 — Arjuna Vishada Yoga
BG 1.18📚 Go to Chapter 1
द्रुपदोद्रौपदेयाश्चसर्वशःपृथिवीपते|सौभद्रश्चमहाबाहुःशङ्खान्दध्मुःपृथक्पृथक्||१-१८||
drupado draupadeyāśca sarvaśaḥ pṛthivīpate . saubhadraśca mahābāhuḥ śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak ||1-18||
द्रुपदो: Drupada | द्रौपदेयाश्च: the sons of Draupadi and | सर्वशः: all | पृथिवीपते: O Lord of the earth | सौभद्रश्च: the son of Subhadra (Abhimanyu) and | महाबाहुः: the mighty-armed | शङ्खान्दध्मुः: conches blew | पृथक्पृथक्: separately
Swami Sivananda English Translation
1.18. Drupada and the sons of Draupadi, O Lord of the earth, and the son of Subhadra, the mighty-armed, blew their conches separately.
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
हे पृथ्वीपति! द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रगण और महाबाहु सौभद्र (अभिमन्यु) — इन सभी ने पृथक्-पृथक् शंख ध्वनि की।
English
Swami Gambirananda
Swami Adidevananda
Hindi
Swami Ramsukhdas
Sanskrit
Sri Ramanuja
Sri Madhavacharya
Sri Anandgiri
Sri Jayatirtha
Sri Abhinav Gupta
Sri Madhusudan Saraswati
Sri Sridhara Swami
Sri Dhanpati
Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sri Purushottamji
Sri Neelkanth
Sri Vallabhacharya
Sri Abhinav Gupta Commentary (English)
1.12 1.29 Sri Abhinavgupta did not comment upon this sloka.
Swami Ramsukhdas Commentary (Hindi)
।।1.17 -- 1.18।। हे राजन्! श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओंवाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु - इन सभी ने सब ओर से अलग-अलग (अपने-अपने) शंख बजाये।
।।1.118।। व्याख्या--'काश्यश्च परमेष्वासः৷৷.शङ्खान् दध्मुः पृथक्पृथक्'--महारथी शिखण्डी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्ममें स्त्री (काशिराजकी कन्या अम्बा) था और इस जन्ममें भी राजा द्रुपदको पुत्रीरूपसे प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखण्डी स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्मजी इन सब बातोंको जानते थे और शिखण्डीको स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इसपर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुनने युद्धके समय इसीको आगे करके भीष्मजीपर बाण चलाये और उनको रथसे नीचे गिरा दिया। अर्जुनका पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्धके समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूहमें घुसकर अपने पराक्रमसे बहुत-से वीरोंका संहार किया। अन्तमें कौरवसेनाके छः महारथियोंने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इसपर शस्त्रअस्त्र चलाये। दुःशासनपुत्रके द्वारा सिरपर गदाका प्रहार होनेसे इसकी मृत्यु हो गयी। सञ्जयने शंखवादनके वर्णनमें कौरवसेनाके शूरवीरोंमेंसे केवल भीष्मजीका ही नाम लिया और पाण्डवसेनाके शूरवीरोंमेंसे भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरोंके नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सञ्जयके मनमें अधर्मके पक्ष-(कौरवसेना-) का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्मके पक्षका अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परन्तु उनके मनमें धर्मके पक्ष-(पाण्डवसेना-) का आदर होनेसे और भगवान् श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंके प्रति आदरभाव होनेसे वे उनके पक्षका ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्षका वर्णन करनेमें ही उनको आनन्द आ रहा है।  सम्बन्ध--पाण्डवसेनाके शंखवादनका कौरवसेनापर क्या असर हुआ--इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं।