BG 2.27 — सांख्य योग
BG 2.27📚 Go to Chapter 2
जातस्यहिध्रुवोमृत्युर्ध्रुवंजन्ममृतस्य|तस्मादपरिहार्येऽर्थेत्वंशोचितुमर्हसि||२-२७||
jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca . tasmādaparihārye.arthe na tvaṃ śocitumarhasi ||2-27||
जातस्य: of the born | हि: for | ध्रुवो: certain | मृत्युर्ध्रुवं: death | जन्म: birth | मृतस्य: of the dead | च: and | तस्मादपरिहार्येऽर्थे: therefore | न: not | त्वं: thou | शोचितुमर्हसि: to grieve
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जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है; इसलिए इस अपरिहार्य विधान के विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
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Swami Ramsukhdas Commentary
।।2.27।। क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
2.27।। व्याख्या-- 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च'-- पूर्वश्लोकके अनुसार अगर शरीरीको नित्य जन्मने और मरनेवाला भी मान लिया जाय, तो भी वह शोकका विषय नहीं हो सकता। कारण कि जिसका जन्म हो गया है, वह जरूर मरेगा और जो मर गया है, वह जरूर जन्मेगा।  'तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि'-- इसलिये कोई भी इस जन्म-मृत्युरूप प्रवाहका परिहार (निवारण) नहीं कर सकता; क्योंकि इसमें किसीका किञ्चिन्मात्र भी वश नहीं चलता। यह जन्म-मृत्युरूप प्रवाह तो अनादिकालसे चला आ रहा है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। इस दृष्टिसे तुम्हारे लिये शोक करना उचित नहीं है। ये धृतराष्ट्रके पुत्र जन्में हैं, तो जरूर मरेंगे। तुम्हारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे तुम उनको बचा सको। जो मर जायेंगे, वे जरूर जन्मेंगे। उनको भी तुम रोक नहीं सकते। फिर शोक किस बातका?शोक उसीका कीजिये जो अनहोनी होय। अनहोनी होती नहीं होनी है सो होय।।जैसे, इस बातको सब जानते हैं कि सूर्यका उदय हुआ है, तो उसका अस्त होगा ही और अस्त होगा तो उसका उदय होगा ही। इसलिये मनुष्य सूर्यका अस्त होनेपर शोक-चिन्ता नहीं करते। ऐसे ही हे अर्जुन! अगर तुम ऐसा मानते हो कि शरीरके साथ ये भीष्म, द्रोण आदि सभी मर जायँगे, तो फिर शरीरके साथ जन्म भी जायँगे। अतः इस दृष्टिसे भी शोक नहीं हो सकता।भगवान्ने इन दो (छब्बीसवें-सत्ताईसवें) श्लोकोंमें जो बात कही है, वह भगवान्का कोई वास्तविक सिद्धान्त नहीं है। अतः 'अथ च' पद देकर भगवान्ने दूसरे (शरीर-शरीरीको एक माननेवाले) पक्षकी बात कही है कि ऐसा सिद्धान्त तो है नहीं, पर अगर तू ऐसा भी मान ले, तो भी शोक करना उचित नहीं है। इन दो श्लोकोंका तात्पर्य यह हुआ कि संसारकी मात्र चीजें प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेसे पहले रूपको छोड़कर दूसरे रूपको धारण करती रहती हैं। इसमें पहले रूपको छोड़ना--यह मरना हो गया और दूसरे रूपको धारण करना--यह जन्मना हो गया। इस प्रकार जो जन्मता है, उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है, वह फिर जन्मता है--यह प्रवाह तो हरदम चलता ही रहता है। इस दृष्टिसे भी क्या शोक करेंसम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें पक्षान्तरकी बात कहकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं।